रांची // झारखंड प्रदेश राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के प्रवक्ता कैलाश यादव ने यूजीसी रेगुलेशन (समता संवर्धन एवं समानता) 2025-26 पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाए गए त्वरित स्टे को केंद्र की मोदी सरकार के लिए बड़ा झटका बताया है।
गुरुवार 29 जनवरी 2026 को जारी बयान में कैलाश यादव ने कहा कि यूजीसी समता संवर्धन विनियम बहुपयोगी और समानता को बढ़ावा देने वाला नियम है, लेकिन इसके बावजूद केंद्र सरकार इसे लेकर भ्रम फैलाने में जुटी रही। उन्होंने कहा कि असमानता और सामाजिक भेदभाव के कारण ही हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुल्ला और पायल सहित कई युवाओं को अपनी जान गंवानी पड़ी।
कैलाश यादव ने कहा कि जब केंद्रीय शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने यह दावा किया था कि यूजीसी रेगुलेशन सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में तैयार किया गया है और इसमें किसी तरह का भेदभाव नहीं है, तो फिर सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस पर स्टे लगाया जाना अपने आप में सरकार के दावों पर सवाल खड़ा करता है।
उन्होंने कहा कि राइट टू इक्विटी और राइट टू इक्वालिटी जैसे संवेदनशील मुद्दों पर खासकर हिंदी पट्टी में स्वर्ण समाज के कुछ वर्गों का आक्रोश चिंताजनक है। समानता और असमानता के बीच की खाई को पाटने पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।
राजद प्रवक्ता ने 1990 के मंडल कमीशन आंदोलन का जिक्र करते हुए कहा कि उस दौर के व्यापक विरोध की तुलना में मौजूदा विरोध सीमित है, हालांकि सोशल मीडिया के कारण तथाकथित विकल्पों की सच्चाई सामने आ रही है।
कैलाश यादव ने आरोप लगाया कि केंद्र की मोदी सरकार ने समता संवर्धन विनियम को राजनीतिक लाभ के उद्देश्य से सामने लाया। उन्होंने कहा कि समाज में भेदभाव और नफरत फैलाना सरकार की रणनीति का हिस्सा बन गया है। आने वाले समय में दक्षिण भारत, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में यह मुद्दा ध्यान भटकाने की कोशिश हो सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि देश महंगाई, रुपये की गिरती कीमत, मनरेगा की स्थिति, सोना-चांदी की बढ़ती कीमतों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि जैसे गंभीर मुद्दों से जूझ रहा है, लेकिन इन सब से ध्यान हटाने के लिए ऐसे विवाद खड़े किए जा रहे हैं।
कैलाश यादव ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूजीसी रेगुलेशन 2025-26 पर लगाया गया स्टे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान के लिए करारा तमाचा है।
अंत में उन्होंने मांग की कि देश में ST, SC, OBC और सामान्य वर्गों के बीच व्याप्त असमानता और भेदभाव को रोकने के लिए केंद्र सरकार और न्यायपालिका को स्पष्ट और संवेदनशील रुख अपनाना चाहिए। साथ ही “बटोगे तो कटोगे” जैसे बयानों पर भी सुप्रीम कोर्ट को संज्ञान लेना चाहिए, जो सामाजिक विभाजन और असमानता को बढ़ावा देते हैं।


