20 हजार का मुर्गा, लाखों का दांवरांची में देसी मुर्गा : परंपरा से निकलकर मुनाफे का नया कारोबार


रांची।
रांची के हाट-बाजारों में इन दिनों अगर किसी एक चीज़ की सबसे ज़्यादा चर्चा है, तो वह है देसी मुर्गा। वजह सिर्फ स्वाद या परंपरा नहीं, बल्कि इसकी चौंकाने वाली कीमत और बढ़ता मुनाफा है।
आज रांची और आसपास के इलाकों में ऐसे देसी मुर्गे खुलेआम बिक रहे हैं, जिनकी कीमत 15 से 20 हजार रुपये तक पहुंच चुकी है। कई मामलों में यह आंकड़ा इससे भी ऊपर चला जाता है।
कभी घर के पिछवाड़े पलने वाला देसी मुर्गा अब हाई ब्रीड, हाई डिमांड और हाई वैल्यू वाला कारोबार बन चुका है। इसके पीछे सालों की ब्रीडिंग, बाजार की समझ और परंपरा से जुड़ा एक पूरा तंत्र काम कर रहा है।
परंपरा से शुरुआत, बाजार तक सफर
ग्रामीण भारत में देसी मुर्गा हमेशा से शादी-ब्याह, पर्व-त्योहार और मेहमाननवाज़ी का अहम हिस्सा रहा है।
लेकिन समय के साथ यह परंपरा अब व्यवसाय में बदलती जा रही है।
रांची के ग्रामीण इलाकों में अब मुर्गा पालन सिर्फ घरेलू जरूरत नहीं, बल्कि
योजना, निवेश और मुनाफे का जरिया बन गया है।
खास नस्लों की पहचान, चयनित ब्रीडिंग और ट्रेनिंग—सब कुछ रणनीति के तहत किया जा रहा है।
दक्षिण भारत से झारखंड तक ब्रीडिंग का नेटवर्क
मुर्गा पालकों के अनुसार, हर साल दक्षिण भारत से करीब 5 हजार रुपये में एक जोड़ी उन्नत नस्ल के मुर्गे-मुर्गियां झारखंड लाई जाती हैं।
इन्हें स्थानीय देसी नस्लों के साथ क्रॉस ब्रीडिंग कराया जाता है।
सही देखरेख के बाद तैयार एक मुर्गा बाजार में
15 से 20 हजार रुपये तक में बिक जाता है।
ब्रीडिंग का मकसद:
ताकत
फुर्ती
सहनशक्ति
रोग प्रतिरोधक क्षमता
आकर्षक बनावट
इन मुर्गों को बंद शेड में नहीं, बल्कि खुले वातावरण में पाला जाता है।
संतुलित आहार और नियमित देखरेख ही इनकी ऊंची कीमत की असली वजह है।
मुर्गा पालकों की जुबानी
रांची के अनुभवी मुर्गा पालक सहज स्वांसी और वीरेंद्र कुमार स्वांसी बताते हैं—
“अब लोग सिर्फ खाने के लिए मुर्गा नहीं खरीदते। शौक और खास बनावट वाले मुर्गों की मांग तेजी से बढ़ी है।”
कुछ मुर्गों की चोंच तोते जैसी होती है, कुछ का कद-काठी अलग—
ऐसी खासियतें कीमत कई गुना बढ़ा देती हैं।
छुपा हुआ बाजार और लाखों के दांव
देसी मुर्गों की ऊंची कीमत के पीछे एक छुपा हुआ बाजार भी है—
मुर्गा लड़ाई।
हालांकि यह कानूनी रूप से वैध नहीं है, लेकिन ग्रामीण हाट-बाजारों में यह परंपरा आज भी मौजूद है।
बताया जाता है कि इसमें लाखों रुपये तक के दांव लगाए जाते हैं।
इसी वजह से ताकतवर और फुर्तीले मुर्गों की मांग लगातार बनी रहती है।
सिर्फ खेल नहीं, रोज़गार का जरिया
आज देसी मुर्गा पालन—
शौक नहीं
सिर्फ परंपरा नहीं
बल्कि रोज़गार का मजबूत साधन बन चुका है।
कम लागत में शुरू होने वाला यह काम सही जानकारी के साथ
हर महीने अच्छी कमाई दे रहा है।
सीधी बिक्री से बिचौलियों की भूमिका भी कम हो रही है।
बदलता नजरिया, बढ़ती संभावनाएं
कृषि विशेषज्ञ राजीव परिहार मानते हैं—
“अगर देसी मुर्गा पालन को वैज्ञानिक और कानूनी ढांचे में बढ़ावा मिले, तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए गेमचेंजर साबित हो सकता है।”
देसी नस्लों का संरक्षण, उन्नत ब्रीडिंग तकनीक और सीधा बाजार—
ये तीनों मिलकर रोजगार के नए अवसर पैदा कर सकते हैं।
भारत की प्रमुख देसी मुर्गी नस्लें
असील (Aseel) – ताकत और साहस की पहचान
कड़कनाथ (Kadaknath) – काले मांस और औषधीय गुण
वनराजा (Vanaraja) – मांस और अंडा दोनों के लिए
बसरा (Busra) – उच्च रोग प्रतिरोधक क्षमता
निकोबारी (Nicobari) – बेहतर अंडा उत्पादन
घागस (Ghagus) – हर वातावरण में ढलने वाली नस्ल
झारसिम (Jharsim) – झारखंड के लिए विकसित विशेष नस्ल

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